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‘माननीयों’ के ख़िलाफ़ दर्ज केस की जांच में देरी क्यों, सुप्रीम कोर्ट ने ED, CBI को डांटा

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को प्रतिष्ठित जांच एजेंसियों सीबीआई और ईडी को इस बात के लिए लताड़ लगाई कि वे सांसदों-विधायकों के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमों की जांच में इतना वक़्त क्यों लगा रही हैं। सीजेआई एन.वी. रमना ने जांच एजेंसियों से पूछा है कि वे कारण बताएं कि आख़िर 10-15 सालों से मुक़दमे क्यों लंबित हैं और इनमें चार्जशीट फ़ाइल क्यों नहीं की गई है। 

अदालत ने कहा कि ईडी सिर्फ़ संपत्तियां जब्त करने का काम कर रही है और कुछ नहीं। जस्टिस रमना ने कहा कि इन एजेंसियों को इतना वक़्त क्यों लग रहा है, इस बारे में कोई वजह भी नहीं बताई गई है। 

जस्टिस रमना ने कहा कि इस तरह के मुक़दमों को लटकाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जांच तेज़ गति से होनी चाहिए जिससे लोगों को न्याय मिल सके। सीजेआई ने कहा कि हम इन एजेंसियों के बारे में इसलिए कुछ नहीं कहना चाहते क्योंकि हम इनका मनोबल नहीं गिराना चाहते लेकिन लंबित पड़े मुक़दमों की बात हालात को बयां करती है। 

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विधायकों-सांसदों के ख़िलाफ़ लंबित पड़े मुक़दमों के मामले में सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने कहा कि एक मुक़दमा तो ऐसा है, जिसमें एजेंसी ने कहा है कि यह 2030 में पूरा होगा। इस पर जस्टिस डी.वाई.चंद्रचूड़ ने कहा- माई गॉड। इस बेंच में जस्टिस रमना, जस्टिस चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस सूर्यकांत भी थे। 

हालांकि बेंच ने थोड़ा नरम रूख़ अपनाते हुए यह भी कहा कि अदालतों की ही तरह एजेंसियों को भी स्टाफ़ की कमी से जूझना पड़ता है और चाहे कोई बड़ा हो या छोटा मुक़दमा, लोग चाहते हैं कि उसमें सीबीआई जांच हो। 

सीजेआई ने कहा कि ऐसे मुक़दमे, जिनमें जनप्रतिनिधि भी शामिल होते हैं, इनमें वे अपने पद का दुरुपयोग कर सकते हैं और इस वजह से ही हमें विशेष शर्तें लगानी पड़ीं। 

पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधायकों और सांसदों के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमों को हाई कोर्ट की इजाजत के बिना बंद नहीं किया जा सकेगा। अदालत ने यह भी कहा था कि राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के चयन के 48 घंटे के भीतर आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करना होगा। 

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अदालत तब एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह को निलंबित करने की मांग की गई थी जो अपने उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा नहीं करते हैं।

इस मामले में सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुक़दमों के लंबित होने की बात को स्वीकार किया और कहा कि एक केस से दूसरे केस में जाने के बजाए, मेरा यह मानना है कि हमें इन्हें लेकर तेज़ी से काम करने की ज़रूरत है। 

अदालत ने मेहता से कहा कि वे अगली सुनवाई में इस बात की वजह बताएं कि आख़िर मुक़दमों के निपटारे में इतना वक़्त क्यों लग रहा है। 

माननीयों का आपराधिक रिकॉर्ड

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मोदी कैबिनेट में शामिल 78 मंत्रियों में से 33 यानी 42 फ़ीसदी ने अपने ख़िलाफ़ आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें से चार पर हत्या के प्रयास से जुड़े मामले हैं।

जबकि लगभग 24 यानी 31 प्रतिशत मंत्रियों ने अपने ख़िलाफ़ दर्ज हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती आदि से संबंधित मामलों सहित गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं। एडीआर ने इसके लिए चुनावी हलफनामों का हवाला दिया है। 

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