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विधानसभा चुनाव में दबाव के लिए है शिवसेना का अयोध्या दाँव?

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नवंबर में अयोध्या जाकर राम मंदिर की माँग को हवा देने वाले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे एक बार फिर 15 जून को अयोध्या जाने वाले हैं। उस वक़्त शिवसेना का अपने सहयोगी दल बीजेपी के साथ तनावपूर्ण संबंध था और उद्धव ठाकरे ने विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाने की माँग की थी। आज सम्बन्ध दोस्ताना हैं, लेकिन आने वाले अक्टूबर महीने में राज्य के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं लिहाज़ा उद्धव ठाकरे की अयोध्या यात्रा को 'तीर्थ यात्रा' के रूप में तो नहीं देखा जा सकता।

बीजेपी-शिवसेना में ‘बड़े भाई’ की भूमिका को लेकर लोकसभा चुनाव तक जो ‘युद्ध विराम’ की स्थिति बनी हुई थी उसमें हलचल है और संसद सत्र शुरू होने से पहले अपने 18 सांसदों के साथ उद्धव ठाकरे की अयोध्या यात्रा को उसी हलचल के रूप में देखा जा रहा है।

पिछली बार शिवसेना ने विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ वर्षों से चला आ रहा अपना गठबंधन तोड़ कर लड़ा था और पार्टी को बीजेपी (122) के मुक़ाबले मात्र 64 सीटें जीतने में सफलता मिली थी। तमाम राजनीतिक घटनाक्रम के बाद शिवसेना सरकार में शामिल तो हुई थी लेकिन लोकसभा चुनाव के पूर्व गठबंधन होने तक उसके तेवर विरोधी दलों से भी ज़्यादा तीखे रहे थे। उद्धव ठाकरे ने 24 दिसंबर 2018 की पंढरपुर में एक रैली के दौरान यह तक कह दिया था कि 'ऐसा लगता है कि चौकीदार चोर हो गया है।' यही नहीं उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की तुलना 17वीं सदी में शिवाजी के राज्य पर हमले करने वाले औरंगज़ेब के सेनापति अफ़ज़ल ख़ान की फ़ौज से कर दी थी। लगातार पाँच साल तक नरेंद्र मोदी और देवेंद्र फडणवीस सरकार के कामकाज को लेकर उठाये जाने वाले सवालों के पीछे शिवसेना का एक दर्द साफ़ झलक कर आता था वह था महाराष्ट्र में उसके ‘बड़े भाई’ होने की भूमिका जो बीजेपी ने हथिया ली थी। 

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पार्टी का विस्तार चाहते हैं उद्धव ठाकरे

जब लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन हुआ तो इस बात को दिखाने का बार-बार प्रयास किया गया कि दोनों दलों में बराबरी का हिसाब है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्धव ठाकरे को हाथ पकड़ कर चुनावी सभा के मंच पर उतरे और उन्हें अपना ‘छोटा भाई’ बताया तो देवेंद्र फडणवीस ने उनके घर मातोश्री जाकर उन्हें अपना ‘बड़ा भाई’ बोला। लेकिन राजनीतिक धरातल पर जो स्थिति है वह किसी से छुपी नहीं है। उद्धव ठाकरे फिर से राजनीतिक विस्तार चाहते हैं और इसके चलते उन्होंने लोकसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी की दुखती रग राम मंदिर मुद्दे पर हाथ रखा था।  24 नवंबर, 2018 को उद्धव ठाकरे अयोध्या गए और वहाँ नरेंद्र मोदी से पूछा कि वह बताएँ कि मंदिर कब बनवाएँगे। उन्होंने कहा, 'वह कहते हैं कि राम मंदिर बनाएँगे, पर उसकी तारीख़ नहीं बता रहे हैं। दिन, महीने, साल और पीढ़ियाँ गुज़र गईं, पर कुछ नहीं हुआ।' उद्धव ठाकरे यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा, 'मंदिर बनाने के लिए 56 इंच का सीना नहीं, हिम्मत लगती है। ये लोग राम मंदिर मुद्दे का फ़ायदा उठा कर चुनाव जीतते हैं और उसके बाद गहरी नींद में सो जाते हैं। और मैं कुम्भकर्ण को उठाने आया हूँ।’ 

शायद उद्धव ठाकरे को लगता है कि महाराष्ट्र में अब यदि उन्हें बीजेपी का मुक़ाबला करना है तो अपना दायरा 'मराठी मानुष' से बाहर निकालना होगा। उनके पिता बाल ठाकरे ने भी पार्टी को विस्तार देने के लिए हिन्दुत्व कार्ड का बख़ूबी इस्तेमाल किया था। उद्धव ठाकरे का लोकसभा से पूर्व चला गया अयोध्या कार्ड उनके हिसाब से सफल साबित हुआ और वे अब यह चाह रहे होंगे कि इस कार्ड की चमक बरक़रार रहे इसलिए अयोध्या को भूलेंगे नहीं।

विधानसभा चुनाव में क्या फंसा है पेच?

विधानसभा चुनाव को लेकर वैसे भी सीटों के बँटवारे को लेकर दाँवपेच शुरू हो गए हैं। बीजेपी के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में 135:135 सीटों का फ़ॉर्मूला ज़ाहिर करना शिवसेना को अपने फ्रेम से बाहर जाता हुआ दिख रहा है। जबकि लोकसभा चुनाव के गठबंधन के समय शिवसेना की तरफ़ से कहा गया था कि वह और बीजेपी 288 सदस्यों वाली विधानसभा में 140:140 सीटों पर लड़ेंगी तथा 8 सीटें निर्दलीय विधायकों के लिए छोड़ी जायेंगी जो वर्तमान में सरकार का हिस्सा हैं। लेकिन 135:135 के फ़ॉर्मूले से नयी बहस छिड़ गयी है। इस बहस के पीछे जो एक और कारण है- वह है बीजेपी 2014 के चुनाव में अपनी सहयोगी पार्टियों रामदास आठवले की आरपीआई, महादेव जानकर की राष्ट्रीय समाज पक्ष और विनायक मेटे की शिवसंग्राम पार्टी को 10 सीटें देना चाहती है। बीजेपी इन पार्टियों के प्रत्याशियों को अपने चुनाव चिन्ह पर लड़वाती है जिसका परिणाम यह होता है कि वे आधिकारिक तौर पर उन्हीं के विधायक माने जाते हैं। बीजेपी चाहती है कि इसके लिए 5 सीट ख़ुद छोड़ेगी और 5 सीट शिवसेना छोड़े।

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क्या चाहती है शिवसेना?

इस बार भी बीजेपी की यही नीति है कि वह इन सहयोगी दलों को अपने चुनाव चिन्ह पर ही लड़वाये और अधिक सीट जीतकर ‘बड़ा भाई’ बन जाए? लिहाज़ा शिवसेना यह कह रही है कि वह 50:50 के फ़ॉर्मूले के तहत ही गठबंधन करेगी जो लोकसभा चुनाव के समय तय हुआ था। इन दोनों पार्टियों के गठबंधन में क़रीब एक दर्जन से ज़्यादा उन सीटों का भी पेच फँसा है जो पिछले चुनाव में जीत तो बीजेपी गयी थी लेकिन वे खाते में शिवसेना के रहती थी।

इन्हीं सब समीकरणों को ठीक करने के लिए शिवसेना प्रमुख ने न सिर्फ़ अयोध्या यात्रा की रणनीति अख्तियार की है बल्कि उनकी पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में अब मोदी सरकार को घेरने वाले लेख भी फिर से दिखाई देने लगे हैं।

हाल ही ‘सामना’ ने बेरोज़गारी के आँकड़ों को लेकर संपादकीय लिखी है जिसमें कहा गया है कि सिर्फ़ शब्दों के खेल से किसी समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। संपादकीय में कहा गया कि मोदी के पिछले पाँच वर्षों के कार्यकाल में दस करोड़ नौकरियाँ सृजित करने के वादे में विफल रहने के लिए कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा गाँधी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। शिवसेना का यह हमला आधिकारिक आँकड़े जारी होने के बाद आया है जिसमें भारत की आर्थिक वृद्धि दर इस साल जनवरी-मार्च में पाँच वर्षों में सबसे कम 5.8 फ़ीसदी बताई गई है।

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संजय राय

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