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अफ़ग़ानिस्तान से आए लोग। इनमें कुछ भारतीय भी हैं। (फ़ाइल फ़ोटो)फ़ोटो साभार: ट्विटर/अरिंदम बागची

अफ़ग़ान शरणार्थियों को धर्म के आधार पर छाँटना क्या इंसानियत है?

कुछ लोग चीख चीख कर कह रहे हैं कि भारत धर्मशाला नहीं है। जो ऐसा कह रहे हैं वे शायद नहीं देख पा रहे कि वे धर्मशाला की अवधारणा का ही अपमान कर रहे हैं। क्या धर्मशाला कोई घटिया जगह है? क्या हर कोई अपने घर के अलावा दूसरों के लिए, जो उनके कोई नहीं लगता, धर्मशाला बनवा सकता है, बनवाने की सोच भी सकता है?
अपूर्वानंद

अफ़ग़ानिस्तान अभी पूरी दुनिया के ईमान का इम्तिहान ले रहा है। ईमान, इंसानियत के बगैर जिसके कोई मायने नहीं। अफ़ग़ानिस्तान से आप कैसे पेश आएँगे, इससे आपके चरित्र और नैतिकता का अंदाज़ होगा। ‘आप’ के क्या मायने हैं? हम जानते हैं कि दुर्भाग्यवश यह ‘आप’ देशों की शक्ल में ही पहचाना जाता है। यानी मैं या आप, बतौर इंसान चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि हमारी तरह से कुछ भी करने का फ़ैसला हमारी सरकारें करती हैं। हमारे मुल्कों के नाम पर। और अभी अफ़ग़ानिस्तान के भीतर किसी भी तरह के हस्तक्षेप से बाक़ी मुल्क इंकार कर रहे हैं। मानो, उन्होंने कभी यह किया ही न हो। अफ़ग़ानिस्तान में जनतंत्र और उदार सरकार हो कि एक निरंकुश अनुदार, जनतंत्र विरोधी सरकार हो, यह अफ़ग़ानिस्तान का अंदरूनी मसला है! अगर अफ़ग़ानिस्तान की जनता यही चाहती है तो ये बेचारे जनतंत्र उसमें कर ही क्या सकते हैं? 

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के हावी होने के बाद दुनिया के तथाकथित ताक़तवर मुल्कों की प्रतिक्रिया ऐसी है मानो अफ़ग़ान ही आज के हालात के लिए ज़िम्मेवार हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान की सेना अगर नहीं लड़ सकी तो आख़िर अमेरिका कितनी देर उसे बचा सकता है! इसपर अब इतना लिखा और कहा जा चुका है कि उसमें जोड़ने की ज़रूरत नहीं कि अफ़ग़ानिस्तान की इस दुर्दशा के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस और एशिया में उनके सहयोगी पाकिस्तान की बार-बार की दखलंदाजी और अलग-अलग गिरोहों को हथियारबंद करने की नीति, जिसे वे रणनीति कहते रहे हैं, ज़िम्मेवार रही है। 

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आज तालिबान के काबुल पहुँच जाने पर हैरानी जाहिर की जा रही है। इसपर नहीं कि जिस संगठन को सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य माना जा रहा है, वह अमेरिका जैसी ताक़त के बीस साल तक अफ़ग़ानिस्तान में रहने के बावजूद न सिर्फ़ जीवित कैसे रहा बल्कि इतना शक्तिशाली कैसे बना रहा कि अमेरिका के जाने की ख़बर मिलते ही तालिबान दुबारा एक एक करके अफ़ग़ानिस्तान के इलाक़ों को फतह करते चले गए। और आज वे अफ़ग़ानिस्तान के मालिक हैं। आख़िरकार अमेरिका ने अपनी बनाई सरकार को छोड़कर तालिबान से ही समझौता किया। इस समझौते के बिना क्या तालिबान आज अफ़ग़ानिस्तान में ऐसा कर सकते थे?

अमेरिका और ब्रिटेन को ऐसे पाखंड और बेईमानी की आदत रही है। कुछ जनतंत्र दुनिया को तबाह करके जनतंत्र बने रहते हैं, यह आधुनिकता का ही करिश्मा हो सकता है! बहरहाल! अब हम इसका पोस्टमार्टम ही कर सकते हैं और आगे के लिए दुनिया इससे सबक़ ले सकती है। लेकिन अभी, आज के क्षण में अफ़ग़ानिस्तान के प्रति हमारा क्या रवैया और कर्तव्य हो सकता है?

तालिबान के सत्तासीन होने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में अफ़रा-तफ़री मच गई है। तालिबान के पिछले अवतार की भयानक स्मृति के कारण आज हज़ारों अफ़ग़ानिस्तानी अपना देश छोड़ कर कहीं और पनाह लेना चाहते हैं। पनाह और शरण, ये दो शब्द मजबूरी, बाध्यता से जुड़े हैं। शायद ही कोई अपनी मिट्टी, अपना वतन स्वेच्छया छोड़ना चाहे। लेकिन अभी जब अफ़ग़ानिस्तान के लोग त्राहिमाम करते हुए पूरी दुनिया से शरण मांग रहे हैं तो उसकी प्रतिक्रिया क्या है?

अमेरिका ने कहा कि जिन लोगों ने अमेरिका के साथ मिलकर काम किया, उन्हें वह प्राथमिकता देगा शरण देने में और अपने यहाँ बसाने में। अभी तक वह कोई 20,000 को जगह देने को तैयार हुआ है।

जिसके पैदा किए और बनाए संकट के शिकार अफ़ग़ानी हुए हैं, जिसके चलते वे अपना ही देश छोड़ने को मजबूर हुए हैं, वह देश सिर्फ़ 20,000 को जगह देने को तैयार है, इससे उसकी मानवीयता की पोल खुल जाती है।

लेकिन यह कहा जाना ही चाहिए कि अमेरिका में एक बड़ी आबादी ऐसी है जो ज़्यादा से ज़्यादा अफ़ग़ान लोगों को अपने देश में बसाने की वकालत कर रही है। ऐसे जनमत का होना, सक्रिय और जीवंत होना, जनतंत्र की संभावना का पता तो देता ही है। कनाडा ने भी 20,000 अफ़ग़ान नागरिकों को बसाने की बात कही है। वैसे ही यूरोप के देशों ने भी किया है। सबसे ज़्यादा दबाव पाकिस्तान पर है। ब्रिटेन और अमेरिका ने बार-बार अपने साथ काम करनेवाले अफ़ग़ान नागरिकों के लिए चिंता व्यक्त की है। यह व्यावहारिक रूप से ठीक है क्योंकि ऐसे लोग तालिबान का निशाना बन सकते हैं। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। लेकिन इन देशों ने यह नहीं कहा कि वे धर्म की वजह से किसी को शरण देंगे और किसी को नहीं।

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पाकिस्तान के अलावा जो देश अफ़ग़ानिस्तान का पड़ोसी है, वह है भारत। उसकी प्रतिक्रिया क्या रही? उसने संकट की पहली घड़ी में ही घोषित किया कि वह हिंदू और सिख अफ़ग़ान नागरिकों को शरण देगा। भारत अकेला देश दुनिया में था जिसकी सरकार ने संकटग्रस्त अफ़ग़ानों को धर्मों के दायरे में बाँटकर यह बतलाया कि उसकी सहानुभूति सिर्फ़ हिंदुओं और सिखों के लिए है। यह कहकर कि वह उन्हें न सिर्फ़ शरण देगा बल्कि नागरिकता भी, उसने अफ़ग़ानिस्तान में हिंदुओं और सिखों की जगह और संकटपूर्ण बना दी। इस क्षेत्र में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके तालिबान को वह इसके लिए पाबन्द कर सकता था कि वे अल्पसंख्यकों के अधिकार का सम्मान करें और उनकी हिफाजत करें। यह करने की जगह उसने जो कहा उसका अर्थ यह है कि अगर तालिबान जैसा संगठन सरकार में आ जाए तो अफ़ग़ानिस्तान के अल्पसंख्यकों की उस देश से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

भारत सरकार का रुख भारत के लिए अपमानजनक है, यह ज़रूर कहना चाहिए। चीन से साथ रिश्ते बिगड़ने का ख़तरा उठाकर भारत ने दलाई लामा और उनके अनुयायियों को शरण दी थी। अपने देशों में हिंसा झेल रहे लोगों को जगह देने की परंपरा पर हम गर्व करते रहे हैं।

लेकिन अब हमारी आज की सरकार की राजनीति इतनी संकीर्ण है कि वह देश का दरवाज़ा खोलने के पहले बाहर खड़े व्यक्ति से उसका धर्म पूछ रही है। 

यह देख रहा हूँ कि कुछ लोग चीख चीख कर कह रहे हैं कि भारत धर्मशाला नहीं है। जो ऐसा कह रहे हैं वे शायद नहीं देख पा रहे कि वे धर्मशाला की अवधारणा का ही अपमान कर रहे हैं। क्या धर्मशाला कोई घटिया जगह है? क्या हर कोई अपने घर के अलावा दूसरों के लिए, जो उनके कोई नहीं लगता, धर्मशाला बनवा सकता है, बनवाने की सोच भी सकता है?

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भारत सरकार के मंत्री अफ़ग़ानिस्तान के इस संकट का लाभ उठाकर नागरिकता के क़ानून में किए गए संशोधन को जायज़ ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। वे झूठ बोल रहे हैं। इस क़ानून में साल की पाबंदी है, यानी 2014 के बाद जो हिंदू या सिख अफ़ग़ानिस्तान से भारत आकर नागरिकता लेना चाहेगा, उसे इस क़ानून के रास्ते वह नहीं मिल सकेगी। फिर यह झूठ क्यों बोला जा रहा है? समझना कठिन नहीं है। क्योंकि बार-बार यह बोलकर उस क़ानून में व्यक्त साम्प्रदायिकता को वैध ठहराने की कोशिश की जा रही है।

ध्यान रहे, इस क़ानून के ज़रिए भारत के दूसरे पड़ोसी श्रीलंका के संकटग्रस्त तमिल हिंदू भी भारत की नागरिकता नहीं ले सकते। यह इसलिए कि मुसलमानों को ही सामने रखने के मक़सद से अपने पड़ोसी मुल्कों में इस सरकार ने सिर्फ़ मुसलमान बहुल देशों के, यानी पकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान, ग़ैर-मुसलमान लोगों को भारतीय नागरिकता का प्रस्ताव दिया है। वह भी अगर वे 2014 के पहले भारत आ गए हों।

दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी एजेंसी के बाहर अफ़ग़ान लोग माँग कर रहे हैं कि उन्हें भारत में शरणार्थी का दर्जा दिया जाए। क्या हम भी अपनी सरकार की तरह ही संकुचित दृष्टि से पहले उन्हें धर्म के आधार पर छांटेंगे और फिर अपना दरवाजा खोलेंगे?

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