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सरकार के अड़ियल रवैये से उच्च न्यायालयों में पद खाली: SC

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के बढ़ते खाली पदों को भरने में केंद्र सरकार की ओर से हो रही देरी पर एक बार फिर नाराज़गी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक आदेश में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा सिफारिशों को मंजूरी देने के वर्षों बाद भी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं होने का कारण सरकार का ‘अड़ियल रवैया’ है।

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की खंडपीठ ने डंपिंग रोधी कार्यवाही संबंधी एक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश के ख़िलाफ़ दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियाँ कीं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि उच्च न्यायालय मामले की जल्द सुनवाई करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि यह अपनी आधी क्षमता से काम कर रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए अहम है कि अदालतें लंबित मामलों के भार तले दबते जा रही हैं फिर भी अदालतों में जजों के पद ज़्यादा ही खाली होते जा रहे हैं। यह सिर्फ़ ज़िला अदालतों की स्थिति नहीं है, बल्कि हाई कोर्ट की भी स्थिति है। सुप्रीम कोर्ट के बार-बार नाराज़गी जताने के बाद भी इसमें देरी हो रही है। खाली पद लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। 2006 में देश भर के उच्च न्यायालयों में जहाँ स्वीकृत 726 पदों में से 154 खाली थे वहीं अब स्वीकृत क़रीब ग्यारह सौ पदों में से क़रीब आधे खाली हैं। 

लोकसभा में उठाए गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में कहा था कि हाई कोर्ट के जजों के 453 पद खाली पड़े हैं। उच्च न्यायालयों में 1098 न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं।

ज़िला न्यायालयों की भी हालत कुछ ऐसी ही है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन लोकुर ने एक लेख में लिखा था कि 2019 में स्वीकृत 22 हज़ार 999 पदों में से 5045 पद खाली हैं।

इन पदों के खाली होने का असर लंबित मामलों पर भी पड़ा। 2006 में उच्च न्यायालयों में जहाँ क़रीब 35 लाख केस लंबित थे वे बढ़कर अब 57 लाख से ज़्यादा हो गए हैं। ज़िला अदालतों में 2006 में जहाँ 2.56 करोड़ केस लंबित थे वे अब 3.81 करोड़ लंबित हैं।

इसी के मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी काफ़ी अहम है। ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सोमवार को कहा कि यह देश की राजधानी सहित दूसरे उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की संख्या में अपर्याप्तता का प्रत्यक्ष परिणाम है। पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल माधवी दीवान को कहा कि सिफारिशों को कॉलेजियम तक पहुँचने में महीनों और साल लगते हैं और उसके बाद महीनों और वर्षों में कॉलेजियम के बाद कोई निर्णय नहीं लिया जाता है। इसलिए उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की कम संख्या होगी तो महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी जल्दी निर्णय लेना लगभग असंभव हो जाएगा।

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पीठ ने केंद्र सरकार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक मामले में 20 अप्रैल को पारित आदेश में सुझाई गई नियुक्तियों की समय-सीमा की भी याद दिलाई। उच्च न्यायालयों की दयनीय स्थिति को स्पष्ट करने के लिए उस आदेश में राष्ट्रीय राजधानी में उच्च न्यायालयों की क्षमता का उल्लेख किया गया। दिल्ली उच्च न्यायालय में एक सप्ताह में 50% से कम न्यायाधीश होंगे, जहाँ स्वीकृत 60 न्यायाधीशों की संख्या में से केवल 29 न्यायाधीश होंगे। इसी संदर्भ में आदेश में कहा गया है कि दो दशक पहले जब न्यायमूर्ति संजय किशन कौल को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था, तो उन्हें 33 न्यायाधीशों की संख्या में से 32वें न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था।

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दिल्ली हाईकोर्ट की स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हाईकोर्ट से यह कहने की स्थिति में नहीं है कि मामले को समयबद्ध तरीके से निपटाया जाए। अप्रैल 2021 में सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने एक मामले में नियुक्ति प्रक्रिया के प्रत्येक चरण के लिए समय-सीमा का संकेत देते हुए आदेश पारित किया था।हाल ही में क़ानून मंत्री ने भी लोकसभा को यह बताया था कि रिक्तियों को भरने के लिए आवश्यक समय-सीमा का संकेत देना संभव नहीं है क्योंकि यह ‘कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक सतत, एकीकृत और सहयोगी प्रक्रिया’ है।
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