भूखे भजन न होई गोपाला। पुरानी कहावत है। जब मैं हर रात इस चिंता में रहूँ कि कल सुबह खाना नसीब होगा कि नहीं, कितने बजे आएगा, कितना मिलेगा, ठीक इसी घड़ी कोई मेरी आध्यात्मिक चिकित्सा करने आ धमके तो मैं उसके साथ कैसा बर्ताव करूँगा?
कंप्लीट लॉकडाउन की घोषणा के बाद महानगरों से लौट रहे दिहाड़ी मजदूरों को सरकार और उसके आश्वासनों पर भरोसा नहीं है। इसलिये वे इन महानगरों को छोड़कर जा रहे हैं।
कोरोना वायरस के फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन किया गया तो हज़ारों लोग पैदल ही घर की ओर निकल गए। आख़िर ये चुपचाप निकल क्यों गए? इन्होंने आवाज़ क्यों नहीं उठाई?
युद्ध, महामारी, ये दो ऐसी स्थितियाँ हैं जिनमें हम सबको भेदभाव भुलाकर न सिर्फ़ एक हो जाने के लिए कहा जाता है, बल्कि राज्य से भी एक हो जाने के लिए कहा जाता है। इसलिए विद्रोह की बात तो कोई सोच ही नहीं सकता।
दिल्ली में हुई हिंसा क्या अचानक हो गई? नहीं, इसके लिये लंबे समय से तैयारी की जा रही थी। हिंदू जातियों विशेषकर जाटों के बीच इसलाम के ख़िलाफ़ प्रचार किया जा रहा है।
दिल्ली के दंगों में हज़ारों लोगों का सब कुछ तबाह हो गया। मुस्तफ़ाबाद का शिव विहार इलाक़ा मुसलमानों से खाली हो चुका है। बिना सुरक्षा के भरोसे के वे लोग कैसे वापस अपने घरों में जाएंगे?
ऑश्वित्ज़ एक क़त्लगाह का नाम है। ऑश्वित्ज़ में कैद और अनिवार्य हत्या की प्रतीक्षा कर रहे लोगों में से जो बचे रह गए थे उन्हें आज से 75 साल पहले, 27 जनवरी, 1945 को सोवियत संघ की लाल सेना ने मुक्त किया।
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ धरने पर बैठी औरतें घरों की चौखट लाँघकर आई हैं, इसलिए कि इस बार सरकार का हमला उनके वजूद पर हुआ है और इसे उन्होंने महसूस किया है।
जेएनयू में कौन थे ये गुंडे? क्या ये सत्ताधारी दल से जुड़े थे? क्या ये किसी छात्र संगठन के थे? वे इतने इत्मीमान से निकल कैसे गए? एक भी पकड़ा क्यों न जा सका?